हालांकि मानव जीवन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता है, किंतु वे भी अपने दीर्घ जीवन के लिए मनुष्यों पर निर्भर करते हैं. प्रकृति में विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों के बीच संतुलन को सुनिश्चित करने के कई साधन और तरीके हैं. बहरहाल, मानव गतिविधियों में हो रही प्रगति के फलस्‍वरूप प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग हो रहा है. प्राकृतिक संसाधनों में मूल रूप से भूमि, जल, वायु, खनिज आदि हैं, उनका उपयोग/दोहन, उनकी प्राकृतिक पुनःपूर्ति की गति से काफी अधिक है. प्रदूषण और वैश्विक तापमान बढ़ाकर औद्योगिकीकरण और अन्य विभिन्न विकासशील प्रक्रियाओं ने इस समस्‍या को और बढ़ा दिया है. आज पृथ्वी का भविष्य खतरे में है. जल, जमीन और हवा आदि महत्वपूर्ण संसाधन सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं. यद्यपि संसाधनों के विकास की योजना से संवृद्धि आती किंतु प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से पर्यावरण और संसाधनों का ह्रास होता है.
भूमि, पानी एवं हवा के क्षरण और अन्य जटिल समस्याएं जैसे क्षारीयता/लवणता, जल जमाव, मृदा अम्लता के कारण भारत में लगभग 146.82 लाख हेक्टेयर भूमि प्रभावित हुई है. क्षरणता, लवणता और क्षारीयता के अलावा अनौचित्‍यपूर्ण तथा असंतुलित उर्वरक के उपयोग से हमारी मिट्टी का कार्बन तो खत्‍म हो ही रहा है तथा उसके पोषक तत्‍व भी नष्‍ट हो रहे हैं. हमें इसका तुरंत उपाय खोजना होगा क्‍योंकि हमारी दो-तिहाई जमीन खराब या रुग्‍ण है. हमारे देश के कई हिस्‍से सूखा और बाढ़ से प्रभावित है. देश का बड़ा भूभाग कृषि के लिए बारिश पर निर्भर करता है. अधिक मात्रा में वनों की कटाई और मिट्टी के अनाच्छादन के कारण, कई क्षेत्रों में वर्षा का पानी भूमि के भीतर ही रिस जाता है और जलाशयों की भरपाई नहीं हो पाती है और पानी काफी मात्रा में बह जाता है. कृषि तथा अन्य उपयोगों के लिए भी उपलब्ध भूजल का दोहन किया जा रहा है. किसी भी देश के आर्थिक विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन एक महत्वपूर्ण पहलू है. भारतीय परिस्थितियों में यह और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि सीमित प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग से ही बढ़ती आबादी के लिए खाद्य सामग्री जुटाई जा सकती है.
नाबार्ड और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन
नाबार्ड एक शीर्ष संस्था के रूप में से सीधे और परोक्ष रूप से उपर्युक्‍त चुनौतियों के समाधान के लिए प्रयासरत है.  प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन हेतु नाबार्ड की नीति यह है कि “संसाधन की स्थितियों में सुधार लाकर ग्रामीण समुदाय के जीविकोपार्जन और उनकी जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाया जाए”. नीति में संकेत किया गया है कि जीविकोपार्जन के साधन बढ़ाने, गरीबी कम करने और पारिस्थितिक टिकाऊपन के लिए प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर संरचनात्‍मक प्रभाव डालने हेतु नाबार्ड इस क्षेत्र में सीधा हस्तक्षेप करेगा.
नाबार्ड ने अपने विभिन्न कार्यक्रमों जैसे वॉटरशेड विकास, जनजातीय विकास कोष के तहत वाडी कार्य

हालांकि मानव जीवन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता है, किंतु वे भी अपने दीर्घ जीवन के लिए मनुष्यों पर निर्भर करते हैं. प्रकृति में विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों के बीच संतुलन को सुनिश्चित करने के कई साधन और तरीके हैं. बहरहाल, मानव गतिविधियों में हो रही प्रगति के फलस्‍वरूप प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग हो रहा है. प्राकृतिक संसाधनों में मूल रूप से भूमि, जल, वायु, खनिज आदि हैं, उनका उपयोग/दोहन, उनकी प्राकृतिक पुनःपूर्ति की गति से काफी अधिक है. प्रदूषण और वैश्विक तापमान बढ़ाकर औद्योगिकीकरण और अन्य विभिन्न विकासशील प्रक्रियाओं ने इस समस्‍या को और बढ़ा दिया है. आज पृथ्वी का भविष्य खतरे में है. जल, जमीन और हवा आदि महत्वपूर्ण संसाधन सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं. यद्यपि संसाधनों के विकास की योजना से संवृद्धि आती किंतु प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से पर्यावरण और संसाधनों का ह्रास होता है.
भूमि, पानी एवं हवा के क्षरण और अन्य जटिल समस्याएं जैसे क्षारीयता/लवणता, जल जमाव, मृदा अम्लता के कारण भारत में लगभग 146.82 लाख हेक्टेयर भूमि प्रभावित हुई है. क्षरणता, लवणता और क्षारीयता के अलावा अनौचित्‍यपूर्ण तथा असंतुलित उर्वरक के उपयोग से हमारी मिट्टी का कार्बन तो खत्‍म हो ही रहा है तथा उसके पोषक तत्‍व भी नष्‍ट हो रहे हैं. हमें इसका तुरंत उपाय खोजना होगा क्‍योंकि हमारी दो-तिहाई जमीन खराब या रुग्‍ण है. हमारे देश के कई हिस्‍से सूखा और बाढ़ से प्रभावित है. देश का बड़ा भूभाग कृषि के लिए बारिश पर निर्भर करता है. अधिक मात्रा में वनों की कटाई और मिट्टी के अनाच्छादन के कारण, कई क्षेत्रों में वर्षा का पानी भूमि के भीतर ही रिस जाता है और जलाशयों की भरपाई नहीं हो पाती है और पानी काफी मात्रा में बह जाता है. कृषि तथा अन्य उपयोगों के लिए भी उपलब्ध भूजल का दोहन किया जा रहा है. किसी भी देश के आर्थिक विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन एक महत्वपूर्ण पहलू है. भारतीय परिस्थितियों में यह और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि सीमित प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग से ही बढ़ती आबादी के लिए खाद्य सामग्री जुटाई जा सकती है.
नाबार्ड और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन
नाबार्ड एक शीर्ष संस्था के रूप में से सीधे और परोक्ष रूप से उपर्युक्‍त चुनौतियों के समाधान के लिए प्रयासरत है.  प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन हेतु नाबार्ड की नीति यह है कि “संसाधन की स्थितियों में सुधार लाकर ग्रामीण समुदाय के जीविकोपार्जन और उनकी जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाया जाए”. नीति में संकेत किया गया है कि जीविकोपार्जन के साधन बढ़ाने, गरीबी कम करने और पारिस्थितिक टिकाऊपन के लिए प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर संरचनात्‍मक प्रभाव डालने हेतु नाबार्ड इस क्षेत्र में सीधा हस्तक्षेप करेगा.
नाबार्ड ने अपने विभिन्न कार्यक्रमों जैसे वॉटरशेड विकास, जनजातीय विकास कोष के तहत वाडी कार्यक्रम, ग्रामीण आवास कार्यक्रम, पर्यावरण संवर्धन सहायता, ग्रामीण नवोन्‍मष निधि और कृषि नवोन्‍मेष और संवर्धन निधि (FIPF) आदि के माध्यम से प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (एनआरएम) के क्षेत्र में अग्रणी और नवोन्‍मेषी काम किया है. इसके अतिरिक्‍त विकास में जन सहभागिता के रूप में किसान क्लब (FCs), संयुक्त देयता समूह (JLGs), स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) आदि के माध्‍यम से नाबार्ड ने अनेक प्रयोग भी किए हैं. इन उपायों के माध्यम से, नाबार्ड ने अपने प्रयोगों को सफल बनाया और इनसे सफल मॉडल उभर कर सामने आए हैं. व्यापक पैमाने पर इनके लिए अधिक भागीदारों, सार्वजनिक एवं निजी निवेशों की आवश्यकता है. यद्यपि नाबार्ड, नीति का समर्थन करेगा और क्षमता निर्माण की आवश्‍यकताओं की पूर्ति करेगा किंतु यह वित्तीय संस्थाओं पर निर्भर करेगा कि वे किस तरह से जीविकोपार्जन आधारित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को वित्तपोषण करने में आगे आएंगे और किस तरह तकनीकी संस्थान उपयुक्त प्रौद्योगिकी के संबंध में मदद देंगे.
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन की गतिविधियों पर ध्यान देने और बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. नाबार्ड ने प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन केंद्र (NRMC) की स्‍थापना कोलकाता में की है. नाबार्ड के एक ब्रांड संस्था के रूप में प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन केंद्र (NRMC) को देखा जा रहा है. यह एक उत्कृष्ट संस्था है. यह प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन केंद्र नाबार्ड की नेतृत्व पर भूमिका में सहायक है.
उद्देश्य और कार्य
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन केन्‍द्र का मूल उद्देश्य ग्रामीण प्राकृतिक संसाधनों के सतत् प्रबंधन से ग्रामीण गरीबों के जीविकोपार्जन में सुधार लाना है. इसके लिए, केन्द्र निम्‍नलिखित कार्य करेगा :

    • उपलब्ध उपयुक्त तकनीक की पहचान करना और उसके अंतरण के लिए तैयारी करना
    • उपयुक्त प्रौद्योगिकियों की उपयोगिता और आवश्‍यकता के संबंध में संबंधित व्‍यक्तियों और हित धारकों में जागरूकता लाना और उनकी क्षमता निर्माण करना
    • सफल मॉडल की पहचान और उनका प्रलेखन.
    • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन केन्‍द्र में सफल मॉडलों को क्रियान्‍वित करने की सुविधा और प्रौद्योगिकी का अंतरण
    • प्रौद्योगिकी और ऋण के समेकित उपयोग से प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर आधारित जीविकोपार्जन की सुविधा उपलब्‍ध कराना
    • सीडीएम प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना और सी-क्रेडिट कमाई की सुविधा
    • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर विशेष अध्ययन, बैठकें, कार्यशालाएं, कार्रवाई अनुसंधान / शोध आदि
    • शैक्षणिक संस्थानों, अनुसंधान संगठनों, नीति बनाने वाले संस्थाओं, तकनीकी संस्थान, वित्तीय संस्थानों, जीविकोपार्जन संवर्धन संस्थानों के साथ नेटवर्क स्‍थापित करना.
    • बहु क्षेत्रीय और बहु अनुशासनिक दृष्टिकोण अपनाना.
    • नीति संबंधी फ़ीडबैक प्राप्‍त करना और पैरवी करना
    • विभिन्न हितधारकों के लिए प्रासंगिक साहित्य प्रकाशित करना
    • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के सम्बन्ध में संसाधनों, प्रौद्योगिकी और दृष्टिकोणों पर व्यापक डाटाबेस रखना
    • विभिन्न हितधारकों के लिए सूचना और ज्ञान के प्रणालियों (IKM) की स्‍थापना और उसका रखरखाव करना
    • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन से संबंधित विकासोन्‍मुख प्रौद्योगिकी के वितरण केन्‍द्र के रूप में कार्य करना.

प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन केन्‍द्र काफोक सक्षेत्र
केंद्र का प्रमुख कार्यक्षेत्र भूमि, पानी, वानिकी और जैविक संसाधनों से संबंधित होगा. केन्‍द्र कृषि उत्पादन की सहायक प्रणालियों और नवीकरणीय ऊर्जा पर ध्यान केन्द्रित करने के साथ-साथ निम्‍नलिखित राष्ट्रीय प्राथमिकताओं / वैश्विक चिंताओं / पूर्वी और उत्तर पूर्वी क्षेत्रीय समस्‍या की और भी ध्‍यान देगा :

    • खाद्य सुरक्षा संबंधी समस्‍याएं
    • प्रति वर्ष 4% की औसत से कृषि में सतत विकास
    • जलवायु परिवर्तन (प्रूफिंग, अडेप्‍टेशन, मिटिगेशन)
    • आपदा प्रबंधन (पूर्वी क्षेत्र में बाढ़ नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना)
    • ऊर्जा सुरक्षा – नवीकरणीय ऊर्जा (जैव-ईंधन, सौर ऊर्जा, वायु)  की आवश्यकता
    • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन आधारित जीविकोपार्जन दृष्टिकोण को बढ़ावा देना/प्रसार करना
    • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन क्षेत्र हेतु अनुकूल वित्तीय उत्पादों का विकास
    • अन्य संबंधित क्षेत्र (जैसे वितरण मॉडल, जेन्‍डर मुद्दों).

प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन केन्‍द्र की गतिविधियॉं
(1) कार्यशालाएं और बैठकें

    • पृथ्वी दिवस समारोह मनाना
    • विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर ग्रीन वित्त पर कार्यशाला आयोजित करना
    • नाबार्ड के स्थापना दिवस के अवसर पर समुदाय आधारित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर संगोष्ठियां आयोजित करना
    • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन आधारित जीविकोपार्जन संवर्धन हेतु संगोष्ठियां/बैठक  
    • कृषि विज्ञान केन्द्र, अनुसंधान संगठनों के साथ बैठक
    • कृषि एवं किसानों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर परामर्शदात्री संगोष्टियां

जूट रेटिंग की नई प्रौद्योगिकी पर प्रशिक्षण कार्यक्रम
(2) राष्ट्रीय वनरोपण तथा पारिस्थितिकी विकास बोर्ड, एनआईआरजेएएफटी (NIRJAFT), डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (WWF), एनएआईपी (NAIP) के साथ नेटवर्किंग आदि
(3) कार्रवाई अनुसंधान जो जारी हैं – अयोध्या की पहाड़ियों के सीमावर्ती गांवों के लिए वैकल्पिक जीविकोपार्जन, सुंदरबन क्षेत्रों में वेटिवर (Vetiver) वृक्षारोपण से नदी के तटबंधों को मजबूत बनाना
(4) प्रकाशन – प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में नाबार्ड की पहलें, बांग्‍ला भाषा में वाडी, हिंदी, अंग्रेजी और बांग्‍ला भाषाओं में नवोन्‍मेषी जूट रेटिंग का विवरण, ग्रीन वित्त में संभावनाएं, समुदाय आधारित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन
(5) एक्सपोजर दौरा – रसायन मुक्त गांवों, वर्षा जल संचयन, वॉटरशेड, वाडी आदि.

क्रम, ग्रामीण आवास कार्यक्रम, पर्यावरण संवर्धन सहायता, ग्रामीण नवोन्‍मष निधि और कृषि नवोन्‍मेष और संवर्धन निधि (FIPF) आदि के माध्यम से प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (एनआरएम) के क्षेत्र में अग्रणी और नवोन्‍मेषी काम किया है. इसके अतिरिक्‍त विकास में जन सहभागिता के रूप में किसान क्लब (FCs), संयुक्त देयता समूह (JLGs), स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) आदि के माध्‍यम से नाबार्ड ने अनेक प्रयोग भी किए हैं. इन उपायों के माध्यम से, नाबार्ड ने अपने प्रयोगों को सफल बनाया और इनसे सफल मॉडल उभर कर सामने आए हैं. व्यापक पैमाने पर इनके लिए अधिक भागीदारों, सार्वजनिक एवं निजी निवेशों की आवश्यकता है. यद्यपि नाबार्ड, नीति का समर्थन करेगा और क्षमता निर्माण की आवश्‍यकताओं की पूर्ति करेगा किंतु यह वित्तीय संस्थाओं पर निर्भर करेगा कि वे किस तरह से जीविकोपार्जन आधारित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को वित्तपोषण करने में आगे आएंगे और किस तरह तकनीकी संस्थान उपयुक्त प्रौद्योगिकी के संबंध में मदद देंगे.
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन की गतिविधियों पर ध्यान देने और बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. नाबार्ड ने प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन केंद्र (NRMC) की स्‍थापना कोलकाता में की है. नाबार्ड के एक ब्रांड संस्था के रूप में प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन केंद्र (NRMC) को देखा जा रहा है. यह एक उत्कृष्ट संस्था है. यह प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन केंद्र नाबार्ड की नेतृत्व पर भूमिका में सहायक है.
उद्देश्य और कार्य
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन केन्‍द्र का मूल उद्देश्य ग्रामीण प्राकृतिक संसाधनों के सतत् प्रबंधन से ग्रामीण गरीबों के जीविकोपार्जन में सुधार लाना है. इसके लिए, केन्द्र निम्‍नलिखित कार्य करेगा :

    • उपलब्ध उपयुक्त तकनीक की पहचान करना और उसके अंतरण के लिए तैयारी करना
    • उपयुक्त प्रौद्योगिकियों की उपयोगिता और आवश्‍यकता के संबंध में संबंधित व्‍यक्तियों और हित धारकों में जागरूकता लाना और उनकी क्षमता निर्माण करना
    • सफल मॉडल की पहचान और उनका प्रलेखन.
    • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन केन्‍द्र में सफल मॉडलों को क्रियान्‍वित करने की सुविधा और प्रौद्योगिकी का अंतरण
    • प्रौद्योगिकी और ऋण के समेकित उपयोग से प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर आधारित जीविकोपार्जन की सुविधा उपलब्‍ध कराना
    • सीडीएम प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना और सी-क्रेडिट कमाई की सुविधा
    • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर विशेष अध्ययन, बैठकें, कार्यशालाएं, कार्रवाई अनुसंधान / शोध आदि
    • शैक्षणिक संस्थानों, अनुसंधान संगठनों, नीति बनाने वाले संस्थाओं, तकनीकी संस्थान, वित्तीय संस्थानों, जीविकोपार्जन संवर्धन संस्थानों के साथ नेटवर्क स्‍थापित करना.
    • बहु क्षेत्रीय और बहु अनुशासनिक दृष्टिकोण अपनाना.
    • नीति संबंधी फ़ीडबैक प्राप्‍त करना और पैरवी करना
    • विभिन्न हितधारकों के लिए प्रासंगिक साहित्य प्रकाशित करना
    • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के सम्बन्ध में संसाधनों, प्रौद्योगिकी और दृष्टिकोणों पर व्यापक डाटाबेस रखना
    • विभिन्न हितधारकों के लिए सूचना और ज्ञान के प्रणालियों (IKM) की स्‍थापना और उसका रखरखाव करना
    • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन से संबंधित विकासोन्‍मुख प्रौद्योगिकी के वितरण केन्‍द्र के रूप में कार्य करना.